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अब शौक नहीं

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  अब शौक नहीं बहुत मजे किए तेरे प्रेम में, करुणा का छाया पाया। हर दिन बिछड़ा दूर तलक, नहीं मैं तेरा प्यार पाया।। अभिलाषा नहीं अब जीने की, तेरे संग तुम्हारे होकर। अब सहन नहीं हैं, जलन हैं, जो दिल पर चोट लगी हैं मुस्काकर। तूने दर्द दिया हैं, दवा नहीं। मेरे टूटे दिल के टुकड़े पूर्ण किये नहीं। विश्वास था तुझपर मेरी होगी। पर क्या हुआ दूसरों के हो गई भोगी।। क्यों छोड़ दिया राहों में, फिर बदनाम किया। लोगों के नज़र मे गिर गए हम। जब नहीं था साथ देने का इश्क़ में, क्यों खुशी दिया और ज्यादा ग़म।। मैंने इश्क़ किया था तुझसे, सजा भी पाया। ना तू मेरे हुए और न  मैं दूसरों के हो पाया।। बस थोड़ी सी साँसें बाकी हैं, मुझे जीने की। फिर तुझसे कैसे कहूँ, तेरे साथ रहने की।। लेखक - मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) Email: manojkumar830070@gmail.com

तूने तो ईट निकालना बन्द कर दिया दीवार से

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    तूने तो ईट निकालना बंद कर दिया दीवार से कल तक तो तूने, बार- बार निकालती थी ईट दीवार से आज ऐसा तेरा मुँह क्यूँ  फूला हैं, गुब्बारे की तरह! जो तूने बंद कर दिया, आना- जाना! और झरोखा से आँख मिलाना  ऐसा अचानक तुझे क्या हो गया  क्या मेरी यादें भाग गई  और दिल मेरा रूठ गया! तख्ती पर लिखकर मेरा ख़त वो भी तख्ती थी, ईट की.. जब कभी तेरी दीवार पर देखते बन्द दिखी मुझे ईट! मैं हैरान होकर; करने लगे वहीं पर अपना माथा पीट कल मिलने यहीं पर रोज आते, मुझसे ख़ुशी- ख़ुशी बोलती आज क्यूँ नजरें नहीं मिलाती मैं परेशान, मेरा दिल परेशान.. अब कैसें मिलूँ, छुप- छिपकर! सामने तो बन्द दरवाजा और परिवारों का समूह अब लगता हैं , मिलन न होगा यारा! न मैं फिर आऊँगा दोबारा! तुझसे हारे , और तेरे ईट से जो बीच में .. खोड़ हो गया सोचते थे मिल लेंगे दो चार बातें कह लेंगे इस उम्मीद में रोज आते थे, दीवार तक! कि उमर गुजर जायेगी यूँ ही  झरोखा से झाँककर, तेरा गोरा मुखड़ा देखकर! अरे! तूने तो ईट निकलना ही बन्द कर दिया!!!! लेखक- मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) Email: manojkumar...

दिल देने की रुसवाई

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  दिल देने की रुसवाई विद्यालय खुलने ही वाला था, तभी अचानक मेरे दोस्त राजू वहां गेट के सामने पहुंच गए। हम वहां अशोक के पेड़ के नीचे खड़े थे।राजू के इंतजार में, राजू आकर हाथ मिलाए ओर बोले,, यहां क्यों खड़े हो अभी गेट क्यों नहीं खुला । सभी लड़के गुमसुम थे।,, "तभी सफेद कार से सफेद कुर्ता में प्रिंसिपल उपस्थित हुए। ओर पूछने लगे गेट अभी तक क्यो नहीं खुला। जितने लड़के थे वहां पर सब ने एक साथ जवाब दिए। साहब अभी चपरासी नहीं आए हैं। उन्हीं के हाथ में है चाभी , प्रिंसिपल फोन किए। चपरासी दौड़ कर आए गेट खोला गया सभी लड़के और लड़कियां प्रवेश हुए। एकाएक करके प्रार्थना में खड़े हो गए। एक तरफ थी लड़के की लाइन एक तरफ थी लड़कियों की लाइन प्रिंसिपल साहब मंच पर गए प्रार्थना होने लगा। हम और हमारे दोस्त राजू प्रार्थना करने लगे। कुछ ही समय बाद प्रार्थना समाप्त हो गया सभी लोग अपने कमरा में भागे, वहीं और राजू धीमी- धीमी चलने लगा कमरा के ओर। तभी अचानक संयोगवश एक लड़की राजू के शरीर से टकरा गई। लड़की ने गुस्सा से बोला,, दिखाई नहीं पड़ता मूर्ख, राजू माफ़ी मांग कर अपने कमरा में आकर बैठ गया। तब! मास्टर साहब बोलो...

क्यों शक किया मुझपर

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  क्यों शक किया मुझपर दुप्पटे को फाड़कर रुमाल बनाया नहीं जाता। किसी पे गलत इल्ज़ाम लगाकर ठुकराया नहीं जाता।। देखकर ही बेवफ़ा कहा जाता हैं अपनों को, वरना झूठी शिकायतें, अपने इश्क में दर्ज किया नहीं जाता।। आँखों से ही कई गलतियाँ होती हैं। जुदा हो जाता हैं अपना प्यार ओर रोती हैं।। कैसे कहें किसकी गलती हैं अल्फाजों में, झूठी बातें सुनकर बस आँखे भर आती हैं।। ये कैसा इश्क हैं मुझपर । जो चुप हैं आँखो में आँसू डालकर।। नहीं करना था मुझसे प्यार तो पहले बता देती। इस तरह मुझे गलत इल्ज़ाम लगाकर कभी न ठुकराती।। कब तक तेरे वफाओं के पर्दा के पीछे रहूँ। किसी से बातें न करूँ, और उसके सामने न रहूँ।। कब तक तुम झाँककर देखोगी यूँ ही, अपने आशियानों से। मैं तो प्रेम दीवाने हैं मेरे प्रेम के कातिल, किसी के दिल में क्यूँ न रहूँ।। कुछ सोचकर ही तुझे बोलना था। मुझसे पूछताछ करके ही, बेवफ़ा कहना था।। इरादें के शख्त थे हम सब सुन लेते, यूँ ही बैठकर। जब पहले से ही  तुझसे प्यार था, तब मुझे शक करना ही नहीं था।। अब पछताने से तुझे क्या होगा। ज़ख्म देकर यूँ ही , दवा लगाने से क्या होगा।। जितना दर्द होता हैं कहने से,...

एक बूँद

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    एक बूँद आँसू के एक  बूँद इतना गरम क्यों? पता नहीं...! क्या आँखें  आँगीठी हैं। जो आँसुओं को खौला रही हैं। जब रिश्ता टूटता हैं; तब! कैसे छलकते हैं जैसे....! मटके लुढ़क गए हो आँगीठी से.. इतना गरम इतना पानी हैं, ये आँखों वाली मटके में जो वियोग में गर्मा रही हैं। थोड़ा लुढ़कने पर.. टिपटिपाते हैं पानी मात्र एक बूँद.. इतना गरम कैसे होता हैं। आश्चर्यचकित  में हैं हम! पता नहीं... प्यार बाँधते समय, धाराएं सुसुप्त हो जाती हैं। परन्तु बिछड़ने पर.. इतनी तेजी से क्यूँ कितनी रफ़्तार हैं इसमें  यार बोला! साथ नहीं रहूँगा , तो आँसू उठ जाते हैं। इतनी तेजी से बहते हैं, गरम- गरम क्यूँ.. केवल एक बूँद , इतने गरम होते हैं तो सारे बूँद कैसे होंगे ! बड़ी आश्चर्यचकित बात हैं।  किसी से बिछड़ने पर ग़म की, रात ही रात हैं! एक बूँद इतना गरम क्यों?? लेखक- मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) Email: manojkumar830070@gmail.com

रोंगटे खड़े हो गए

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          रोंगटे खड़े हो गए   मैंने देखा, कुछ इस तरह! पीठ पर बच्चा सिर पर बोझ तरबतर पसीना ओठ तक! चढ़ती मंजिल तक रुक रुककर! रोता बच्चा, माँ की आँचल में छुपकर वो रूप.. धूप के तप में जल गए रोंगटे खड़े हो गए। पाँव में छाले, रगड़ती चूड़ियाँ ईट से आँखें नम! बच्चों के खातिर! वो पीड़ा, जीवन के खातिर! धूल फाँकती, धीरे- धीरे चलती! जैसे गिर जायेगी, जमीं पर! अपने परिवार के खातिर हम खड़े होकर देखते रह गए रोंगटे खड़े हो गए। उनको कभी न मिलता , छाँव..! कैसे वो जीवन बिताती क्या कहता होगा ह्रदय, बोझ उठाती और हाँफती! अम्बर उनके चिथड़े, लाज के मारे, बाँधती! रोते बच्चा को, सँभालती! तुम पूछो उनका हाल हम उनको देखते ही आँखों में आँसू आ गए रोंगटे खड़े हो गए।। लेखक- मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) Email: manojkumar830070@ gmail.com

मैंने उम्र की तबीयत देखीं नहीं।

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    मैंने उम्र की तबीयत देखीं नहीं। चल पड़े झोला उठाकर फकीरों की तरह मिलेगी मंजिल मेरी, एक दिन जरूरी! इन्तजार में हूँ, काम पर हूँ लगा हूँ, लगा रहूँगा मेरे हर पथ पर , काँटे क्यूँ न बिछ जाएँ पीछे हटने वाला नहीं हूँ अब निकल पड़ा हूँ, मंजिल की तरफ़ भले ही आग की चिंगारियाँ बरसे, बारिश की तरह मुझे आस्था हैं पहुँचेंगे वहाँ! जिधर मेरी मनसा बुलाती हैं मैं निडर नहीं हूँ फौलाद हैं मेरा जिगर कॉंटे को फूल बना सकता हूँ बस एक मजबूरियाँ हैं मंजिल मुझसे दूर हैं मेरी उम्र की तबीयत बिगड़ी हैं नाज़ुक हैं। सहारा कोई नहीं, सात समंदर पार करना है साथ में मुझे कठिनाइयाँ क्यों न हों जाना हैं पास मे। इसी उम्मीद में जी रहा हूँ। जख्मों को यूँ ही सी रहा हूँ। मुझे पीछे मुड़कर देखना भी नहीं है अब! मुझे निकलना हैं पतली गली से, मंजिल तक जाकर ही तब!!!! लेखक- मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) Email: manojkumar830070@gmail.com