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धुँआ

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    धुँआ   बच गया हैं , भाग रहा हैं दुम उठाकर। मुझे अकेला छोड़ कर बस्तियाँ राख करके तब भगा! कोई कैसे पकड़ पाएगा जो हो गया। अब लौटकर कभी ना आएगा वो तो धुँआ है, हम और तुम नहीं जो पकड़ लोगे, हक हैं उनका भी .. जाने दो । बाल नहीं हैं सिर पर जो तुरन्त पकड़ लोगे जाने दो, रोको मत किसी के मुठ्ठी में आने वाला नहीं हैं रफ़्तार तेज हैं उतना ही तेज धार मैनें देखा हैं किसी को काटते हुए इसलिए उससे डर लगता हैं उसे पकड़ो मत अपने हाथ आने वाला नहीं हैं मेरी बस्तियाँ जल गई हैं कोई बात नहीं हैं इक दिन सबका जलेगा देखना! उसका अधिकार हैं धुँआ हैं। जली मेरी बस्तियाँ तुम क्यूँ मुँह लटकाकर बैठे हो सुबह हैं चमक किरणें  हैं रात भी होगी ये तो कार्य चलता रहता हैं आया धुँआ जलायी बस्तियाँ ,चला गया ये तो होना था पुरानी थी बस्तियाँ चीर काफी पड़े थे पुराने - पुराने अब तो मालिक नया बनवायेगा अच्छा हुआ जल गई तू क्यूँ रो रहा हैं जली मेरी बस्तियाँ धुँआ हैं कभी मत पकड़ना कोई फायदा नहीं होगा पर,  हैं उनके तुम्हारे पास क्या हैं, पैर हैं तुम दौड़ नहीं पायेगा।। लेखक- मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक ज...