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हाय! ये महंगाई है।

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  - हाय! ये महंगाई है!! आओ  चले  सुनाए  सबको महंगाई  की  गान गैस  सिलेंडर  महंगा  हुआ  है लकड़िक  काम  तमाम ॥  पर्यावरण  अब  दूषित  है परेशान  खलिहान पहले  कम  थी  महंगाई पर  अब  तो  निकली  जान ॥  सब्जी  का  तुम  हाल  न  पूछो पूछ  लिए  तुम  ज्ञान पहले  दस  में  थी  आलू अब  नहीं  आसान ॥  चलो  बताए  तेल  की  कीमत  छू  लिए  आसमान   अब  जनता  कैसे  लेगी    वो  भी  है  परेशान ॥      किसी  के  जेब  में  रिश्वत  है  तो      किसी  के  है  सिर्फ़  पान       महंगाई  अब  सर  पे  चढ़ी  है        निकल  रही  है  जान ॥                ...

नरम होंठो की लकीरें

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                      नरम होंठो की लकीरें नरम होंठो की लकीरें बयां कर देती है कितने आशिक़ फिदा हुए तुम पे तू पहले कैसी थी और आज कैसी है ये सब बातें लिख जाती है और वो बताती भी है जमीं बंजर है या बीज बो दिए गए हैं किसी आशिक़ ने बो दिया हैं अपना प्यार हरा भरा करने के लिए न चाहते हुए भी दिखाई पड़ता है नग्न आँखों से लकीरों में.. साफ साफ लिखा होता है कितनी बार नजरों से वार चला है कौन मुलजिम है कौन वकील है सब जानकारी हो जाती है मत कोई बताएं किसी को उसमें लिखा ही होता हैं नरम होंठो की लकीरों पे!!!! लेखक: मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) E-mail: manojkumar830070@gmail.com

आओ चलें मितवा

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                          आओ चलें मितवा आओ चलें मितवा बहुत दूर.. वहीं हम और तुम रहें यहाँ मुझे अच्छा नहीं लगता तेरे साथ इक पल बिताने का वहीं चलते है जहाँ .. हीर रांझा गए थे बहुत दूर जगह पर साथ साथ वही पर हम और तुम जायेंगे यहां पर पंछी समझकर कुछ लोग दोनों को उड़ा रहे है कभी तराजू नहीं उठाए है प्यार नही तौले है कितना वजन होता है कितना कीमत होता है आओ मितवा हम दोनों चले परछाइयां छोड़कर यहां से मेरी दीवानगी सभी लोग देखें कितने मजनू थे  एक दूसरे पर! कितने मरते थे एक अपनी पहचान छोड़कर चलो नाम छोड़कर चलो सबका दुलार छोड़कर चलो हम तुम्हारे साथ रह लेंगे तुम मेरे साथ रहना जीवन बिताएंगे हम दोनों! प्रेम के अशियाना बनाकर किसी से कुछ नहीं कहेंगे बस तुम हाँ करो राजी हो चलने मेरे साथ तुम मेरे प्रिय हो न आओ चलें! देर किस बात की हम है न इस दुनिया कों बोलने दो ये दुनिया खुद जुदा ही है अपने अपने प्रेमी से तुम्हें क्या जीने का रास्ता बताएगी वो ख़ुद भटकी है एक दूसरे से की यादों में तुम इसके बातों में मत आना ये भिगो भिगो कर मारती है इसके पीछ...

मेरी यादों में आ जाओ (गीत)

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  मेरी यादों में आ जाओ (गीत) तेरी मुहब्बत में मुठभेड़ किए अपने जिस्म को तेरे हुस्न में जलाया हैं। तब जाके कहीं तेरा प्यार पाकर तेरा नाम अपने होंठो पर सजाया हैं। ए मेरी जां अफ़सोस न कर , मैं तुझको लेने आऊँगा। जो मधु से मधुर हैं प्रेम तेरा, मैं उसको दिल से अपनाऊँगा। ए मेरी जां तू खुशहाल रहे, मैं तुझको दिल से पाया है। अब जिक्र न कर किसी ओर की, जो दिल में तुझे बसाया है। मेरी यादों में आ जाओ, थोड़ा मुखड़ा तो दिखलाओ, इतनी सी हैं दिल की आरज़ू। मेरे दिल को तू बहलाओ उसको तू समझाओ  इतनी सी है दिल की आरज़ू खुशियों से भरे जो दामन तेरे कोई ऐसी मखणा पा न सका फ़िज़ूल रहा वो वक्त मेरा, जो तेरे पास न जा सका। वो महबूब मेरे, महबूब मेरे तेरा मेरा इश्क प्यारा है। मैं हूँ तेरा सागर तो.. तो तू मेरा किनारा हैं। मेरी यादों में आ जाओ थोड़ा मुखड़ा तो दिखलाओ इतनी सी है दिल की आरज़ू मेरे दिल को तू बहलाओ उसको तू समझाओ इतनी सी हैं दिल की आरज़ू हे जान मेरी तू मुस्काती रहे तेरी मुस्कान कभी भी कम ना हो छूटे न कभी तुझसे प्यार मेरा, तुझे कभी भी ग़म ना हो। हे माशूका मेरी तू इन्तजार न कर मैं तेरी गलियों में आ ऊँगा...

खून से लिखी चिठ्ठी

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  खून से लिखी चिठ्ठी स्वेता की उम्र भी हो गई है। शादी करने का उनके पिता जी काफी चिंतित में रहते हैं। तभी स्वेता की मां पूछती हैं, "हे जी आप क्या सोच रहे हो। चार पाई पर बैठ कर स्वेता के पिता बोलते हैं।, " नहीं जी कुछ नहीं बस यही सोच रहे थे कि बेटी की उम्र भी हो गई है । शादी करने का अब क्या होगा, पैसा कहां से इक्कठा करे। स्वेता के पिता काफी देर तक सोचते हैं और बोल पड़ते हैं। जो किए हम दोनों के बीच में बाते उस बात को वहीं पर रहने दो।" बेटी को कुछ मत बताना कि पिता जी के पास पैसा नहीं है। और उम्र भी हो गई शादी करने की स्वेता की मां बोलती है ठीक है जी मैं कभी भी नहीं बोलूंगी। "इतनी सी बातें करने के बाद स्वेता कि मां रसोई घर में चली जाती है, और स्वेता के पिता जी खेत के तरफ चले जाते हैं।" तभी स्वेता कॉलेज से लौटकर घर आती हैं। और बोलती है, " मां नमस्ते ! क्या बना रही हो मां तब! उनकी मां बोलती है, आओ बेटी आज खीर बनाई है। स्वेता कहती हैं अच्छा मां तब तो मैं चाव से खाऊंगी भर पेट मां के हाथ से बना खीर। तभी स्वेता की मां कहती हैं, "ठीक है बेटी आज जितना मर्जी उतना त...

प्रेम विवाह

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  प्रेम विवाह इतवार का दिन था।" तो मैंने सोचा आज स्कूल की छुट्टी है। अपने मित्र आकाश को नैनीताल टहलने के लिए आग्रह किया। मैंने फोन किए उसके पास परन्तु वो फोन नहीं उठाया। बात क्या थी कि उस समय गर्मी का महीना था। और तेज बारिश के वजह से बिजली के स्तंभ गिर गए थे। और बिजली भी नहीं आई थी उस समय मै अपनी मोबाइल नहीं चार्ज कर पाया। मै अपने कमरा में बैठ कर सोचने लगे कि फोन क्यों नहीं उठाते, उसके बाद अगले दिन यानी सोमवार को गांव के बच्चे चंदा मांगने आए"बोले भैया जी चंदा मांगने आए हैं। बिजली के स्तंभ के गिर जाने से तार टूट गया है। मिस्त्री बुला के सही करवाना है। मैंने उससे पूछा कितना रुपए देना पड़ेगा" तब उसने बोला 10₹ चाहिए। मैंने 10₹ दिया। और तब जाकर बिजली गांव में आई ओर हम आराम से अपनी मोबाइल चार्ज किए। फिर से कोशिश किए, आकाश के पास फोन करने का उसने तुरंत फोन उठाया। मैंने पूछा चलोगे नैनीताल घूमने आकाश ने ठीक है चलूंगा हम भी छुट्टी में है। मैंने अपने बैग में कपड़ा और कुछ खाने के लिए भी रखा। पहुंच गए रेलवे स्टेशन पुनः फोन किए आकाश के पास, आकाश ने कहा ठीक है बस 2 ही मिनट में पहुंच गय...

हर तरफ़ तनहाइयाँ

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      हर तरफ़ तनहाइयाँ      जिसको मैंने चाहा था, वो अपना होना सकें। वो दिल दे चुके थे पहले से, वो मुझसे आहें भर ना सकें।। कोशिश तो बहुत किये उनपर, अपनी खुशियाँ लुटाने को। पर क्या करें दोस्तों, वो तो मेरी तरफ भी ना देख सकें।। मुहब्बत की दीवारें इतनी बड़ी खड़ी करदी उसने। जाते- जाते वक्त गुजर गए, जा ना सकें उनके सामने।। फिर भी सोच में पड़ है हम, क्या कमी हैं मुझमें। जो मुझे इस तरह मुझसे दूर होकर जा रहे हैं, मेरे नजरों के सामने।। कल तक जिसे मैं अपना कहा, वो तो हो गए सपनों के समान। भूलकर न देखा मुझे, वो देखते ही आँखों के सामने हो गए वीरान।। अब भूलकर भी नहीं भूल सकता, वो पुरानी बातें। जो मुझे अपनी मुहब्बत के सामने कर दिया था अपमान।। थोड़ा रोकर तो गम कम नहीं हो सकता। जो चला गया मुझे छोड़कर, वो फिर आ नहीं सकता।। क्या फ़ायदा हैं मुझे उनकी बातें जेहन में रखकर। वो तो गैर थे, अब अपना हो नहीं सकता।। कसूर तो मेरी नजरों की थी, जो उसे देखा था। कल्पनाओं में प्यार कर बैठे, और अपना कहा था।। कुछ महसूस होने लगा था, शायद मुझे प्यार हो गया। पर क्या करें, मैं तो गलतफहमी में फँसकर ...