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चाँद ये क्यूँ छिप गया हैं।

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                    चाँद ये क्यूँ छिप गया हैं। चाँद ये क्यूँ छिप गया हैं, रोशनी हैं सूनी- सूनी! क्या दिल लगाया हैं किसी से, उनकी दामन सूनी- सूनी! चाँद ये............। रूठना ही था जो दिल से, क्यूँ उससे इजहार किया.. अपना कहकर क्यूँ ये कमर, उससे तनहा प्यार किया! छोड़ दिया क्यूँ उनका आँचल, उनकी बाहें सूनी- सूनी चाँद ये.................। कोई हमसफ़र में पता न था, जो तुझसे नाता जोड़ दिया.. सागर के साहिल तक छोड़ के क्यूँ ये, अपना मुँह क्यूँ मोड़ लिया! छोड़ दिया उनकी राहें क्यूँ, राहें भी अब सूनी- सूनी चाँद ये.................। लेखक- मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) Email: manojkumar830070@gmail.com