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दिल की गहराइयाँ

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                दिल की गहराइयाँ  कौन जाने वो मस्त मौला, मेरे दिल की गहराइयाँ किस पैमाना से नाप दूँ कितने दर्दो से भरा अश्क हैं कैसे पता करें कैसे किसी को बताऊँ अपना दर्द अपना ही जाने यही अच्छा हैं दूसरों को बताने से बुराइयाँ आती हैं कभी- कभी तो वही पलटकर, खुद सताती हैं। न इजहार करें यही अच्छा हैं। कभी- कभी तो मुहब्बत की फुरैया लोग उड़ाते हैं। दूसरों की प्यार की बातें पूछकर अपना खुद नहीं बताते हैं। दिल की हालत अपना खुद जाने रोकर या हँसकर दर्दो को सँभाले जब प्यार टूटता हैं तो होती हैं दिल की गहराइयाँ       दिल की गहराइयाँ नापी कैसें ? बहुत गहरा कर दिया मेरे दिल को उस बेवफा ने कहाँ से लाऊँ मैं पैमाना वो तो हँसकर चली गई, मजाक- मजाक में पर मेरा मुश्किल हैं यहाँ जीना! कैसे सँभालूँ, ये दलदल दिल को कैसे भरूँ ज़ख्म को कुछ समझ में नहीं आता है। कोई आकर समझाए तो कैसे इस गड्डे को पूर्ण करुँ कुछ तो समझाए कोई मुझे बताएँ कोई मुझे अजनबी समझकर जख्मों से गहरा कर दिया अब इसे भरूँ कैसे किसी को दिखाने का, लायक़ भी नहीं रहा क्या हैं अब मेरे पास कैसे...