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        बिन बादल के बारिश कहाँ बिन बादल के बारिश कहाँ बिन सनम के ज़िंदगी कहाँ वक्त क्षण भर में बदल जाता हैं, तब कोई अपना होता हैं पेड़ के छावों में रहा भी तो नहीं जाता तनहाई में गूँज उठती हैं तपे सूर्य में प्यास लगती हैं उसे बुझाना पड़ता हैं। सब अधूरा सा लगता हैं जलती लाश में धुँए, बवंडर सा लगता हैं। जब कोई अपना चला जाता हैं, बन्दी मुठ्ठी खुल जाती हैं यही दुनिया की रीत हैं बाकी सब झूठे हैं सच्चाई दिल की कोई नहीं समझता हैं, ना कोई जानता हैं। कितने लोग प्यार की आहुतियों में जल गए। लेखक- मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) Email: manojkumar830070@gmail.com