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हर तरफ़ तनहाइयाँ

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      हर तरफ़ तनहाइयाँ      जिसको मैंने चाहा था, वो अपना होना सकें। वो दिल दे चुके थे पहले से, वो मुझसे आहें भर ना सकें।। कोशिश तो बहुत किये उनपर, अपनी खुशियाँ लुटाने को। पर क्या करें दोस्तों, वो तो मेरी तरफ भी ना देख सकें।। मुहब्बत की दीवारें इतनी बड़ी खड़ी करदी उसने। जाते- जाते वक्त गुजर गए, जा ना सकें उनके सामने।। फिर भी सोच में पड़ है हम, क्या कमी हैं मुझमें। जो मुझे इस तरह मुझसे दूर होकर जा रहे हैं, मेरे नजरों के सामने।। कल तक जिसे मैं अपना कहा, वो तो हो गए सपनों के समान। भूलकर न देखा मुझे, वो देखते ही आँखों के सामने हो गए वीरान।। अब भूलकर भी नहीं भूल सकता, वो पुरानी बातें। जो मुझे अपनी मुहब्बत के सामने कर दिया था अपमान।। थोड़ा रोकर तो गम कम नहीं हो सकता। जो चला गया मुझे छोड़कर, वो फिर आ नहीं सकता।। क्या फ़ायदा हैं मुझे उनकी बातें जेहन में रखकर। वो तो गैर थे, अब अपना हो नहीं सकता।। कसूर तो मेरी नजरों की थी, जो उसे देखा था। कल्पनाओं में प्यार कर बैठे, और अपना कहा था।। कुछ महसूस होने लगा था, शायद मुझे प्यार हो गया। पर क्या करें, मैं तो गलतफहमी में फँसकर ...