मैंने उम्र की तबीयत देखीं नहीं।
मैंने उम्र की तबीयत देखीं नहीं। चल पड़े झोला उठाकर फकीरों की तरह मिलेगी मंजिल मेरी, एक दिन जरूरी! इन्तजार में हूँ, काम पर हूँ लगा हूँ, लगा रहूँगा मेरे हर पथ पर , काँटे क्यूँ न बिछ जाएँ पीछे हटने वाला नहीं हूँ अब निकल पड़ा हूँ, मंजिल की तरफ़ भले ही आग की चिंगारियाँ बरसे, बारिश की तरह मुझे आस्था हैं पहुँचेंगे वहाँ! जिधर मेरी मनसा बुलाती हैं मैं निडर नहीं हूँ फौलाद हैं मेरा जिगर कॉंटे को फूल बना सकता हूँ बस एक मजबूरियाँ हैं मंजिल मुझसे दूर हैं मेरी उम्र की तबीयत बिगड़ी हैं नाज़ुक हैं। सहारा कोई नहीं, सात समंदर पार करना है साथ में मुझे कठिनाइयाँ क्यों न हों जाना हैं पास मे। इसी उम्मीद में जी रहा हूँ। जख्मों को यूँ ही सी रहा हूँ। मुझे पीछे मुड़कर देखना भी नहीं है अब! मुझे निकलना हैं पतली गली से, मंजिल तक जाकर ही तब!!!! लेखक- मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) Email: manojkumar830070@gmail.com