तूने तो ईट निकालना बन्द कर दिया दीवार से
तूने तो ईट निकालना बंद कर दिया दीवार से
कल तक तो तूने,
बार- बार निकालती थी ईट दीवार से
आज ऐसा तेरा मुँह क्यूँ फूला हैं,
गुब्बारे की तरह!
जो तूने बंद कर दिया,
आना- जाना!
और झरोखा से आँख मिलाना
ऐसा अचानक तुझे क्या हो गया
क्या मेरी यादें भाग गई
और दिल मेरा रूठ गया!
तख्ती पर लिखकर मेरा ख़त
वो भी तख्ती थी,
ईट की..
जब कभी तेरी दीवार पर देखते
बन्द दिखी मुझे ईट!
मैं हैरान होकर;
करने लगे वहीं पर अपना माथा पीट
कल मिलने यहीं पर रोज आते,
मुझसे ख़ुशी- ख़ुशी बोलती
आज क्यूँ नजरें नहीं मिलाती
मैं परेशान,
मेरा दिल परेशान..
अब कैसें मिलूँ,
छुप- छिपकर!
सामने तो बन्द दरवाजा
और परिवारों का समूह
अब लगता हैं ,
मिलन न होगा यारा!
न मैं फिर आऊँगा दोबारा!
तुझसे हारे ,
और तेरे ईट से
जो बीच में ..
खोड़ हो गया
सोचते थे मिल लेंगे
दो चार बातें कह लेंगे
इस उम्मीद में रोज आते थे,
दीवार तक!
कि उमर गुजर जायेगी
यूँ ही झरोखा से झाँककर,
तेरा गोरा मुखड़ा देखकर!
अरे! तूने तो ईट निकलना ही बन्द कर दिया!!!!
लेखक- मनोज कुमार
पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी)


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