रोंगटे खड़े हो गए
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रोंगटे खड़े हो गए
मैंने देखा,
कुछ इस तरह!
पीठ पर बच्चा
सिर पर बोझ
तरबतर पसीना
ओठ तक!
चढ़ती मंजिल तक
रुक रुककर!
रोता बच्चा,
माँ की आँचल में छुपकर
वो रूप..
धूप के तप में जल गए
रोंगटे खड़े हो गए।
पाँव में छाले,
रगड़ती चूड़ियाँ ईट से
आँखें नम!
बच्चों के खातिर!
वो पीड़ा,
जीवन के खातिर!
धूल फाँकती,
धीरे- धीरे चलती!
जैसे गिर जायेगी,
जमीं पर!
अपने परिवार के खातिर
हम खड़े होकर देखते रह गए
रोंगटे खड़े हो गए।
उनको कभी न मिलता ,
छाँव..!
कैसे वो जीवन बिताती
क्या कहता होगा ह्रदय,
बोझ उठाती और हाँफती!
अम्बर उनके चिथड़े,
लाज के मारे,
बाँधती!
रोते बच्चा को,
सँभालती!
तुम पूछो उनका हाल
हम उनको देखते ही आँखों में आँसू आ गए
रोंगटे खड़े हो गए।।
लेखक- मनोज कुमार
पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी)
Email: manojkumar830070@gmail.com
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