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मेरी यादों में आ जाओ (गीत)

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  मेरी यादों में आ जाओ (गीत) तेरी मुहब्बत में मुठभेड़ किए अपने जिस्म को तेरे हुस्न में जलाया हैं। तब जाके कहीं तेरा प्यार पाकर तेरा नाम अपने होंठो पर सजाया हैं। ए मेरी जां अफ़सोस न कर , मैं तुझको लेने आऊँगा। जो मधु से मधुर हैं प्रेम तेरा, मैं उसको दिल से अपनाऊँगा। ए मेरी जां तू खुशहाल रहे, मैं तुझको दिल से पाया है। अब जिक्र न कर किसी ओर की, जो दिल में तुझे बसाया है। मेरी यादों में आ जाओ, थोड़ा मुखड़ा तो दिखलाओ, इतनी सी हैं दिल की आरज़ू। मेरे दिल को तू बहलाओ उसको तू समझाओ  इतनी सी है दिल की आरज़ू खुशियों से भरे जो दामन तेरे कोई ऐसी मखणा पा न सका फ़िज़ूल रहा वो वक्त मेरा, जो तेरे पास न जा सका। वो महबूब मेरे, महबूब मेरे तेरा मेरा इश्क प्यारा है। मैं हूँ तेरा सागर तो.. तो तू मेरा किनारा हैं। मेरी यादों में आ जाओ थोड़ा मुखड़ा तो दिखलाओ इतनी सी है दिल की आरज़ू मेरे दिल को तू बहलाओ उसको तू समझाओ इतनी सी हैं दिल की आरज़ू हे जान मेरी तू मुस्काती रहे तेरी मुस्कान कभी भी कम ना हो छूटे न कभी तुझसे प्यार मेरा, तुझे कभी भी ग़म ना हो। हे माशूका मेरी तू इन्तजार न कर मैं तेरी गलियों में आ ऊँगा...

खून से लिखी चिठ्ठी

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  खून से लिखी चिठ्ठी स्वेता की उम्र भी हो गई है। शादी करने का उनके पिता जी काफी चिंतित में रहते हैं। तभी स्वेता की मां पूछती हैं, "हे जी आप क्या सोच रहे हो। चार पाई पर बैठ कर स्वेता के पिता बोलते हैं।, " नहीं जी कुछ नहीं बस यही सोच रहे थे कि बेटी की उम्र भी हो गई है । शादी करने का अब क्या होगा, पैसा कहां से इक्कठा करे। स्वेता के पिता काफी देर तक सोचते हैं और बोल पड़ते हैं। जो किए हम दोनों के बीच में बाते उस बात को वहीं पर रहने दो।" बेटी को कुछ मत बताना कि पिता जी के पास पैसा नहीं है। और उम्र भी हो गई शादी करने की स्वेता की मां बोलती है ठीक है जी मैं कभी भी नहीं बोलूंगी। "इतनी सी बातें करने के बाद स्वेता कि मां रसोई घर में चली जाती है, और स्वेता के पिता जी खेत के तरफ चले जाते हैं।" तभी स्वेता कॉलेज से लौटकर घर आती हैं। और बोलती है, " मां नमस्ते ! क्या बना रही हो मां तब! उनकी मां बोलती है, आओ बेटी आज खीर बनाई है। स्वेता कहती हैं अच्छा मां तब तो मैं चाव से खाऊंगी भर पेट मां के हाथ से बना खीर। तभी स्वेता की मां कहती हैं, "ठीक है बेटी आज जितना मर्जी उतना त...

प्रेम विवाह

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  प्रेम विवाह इतवार का दिन था।" तो मैंने सोचा आज स्कूल की छुट्टी है। अपने मित्र आकाश को नैनीताल टहलने के लिए आग्रह किया। मैंने फोन किए उसके पास परन्तु वो फोन नहीं उठाया। बात क्या थी कि उस समय गर्मी का महीना था। और तेज बारिश के वजह से बिजली के स्तंभ गिर गए थे। और बिजली भी नहीं आई थी उस समय मै अपनी मोबाइल नहीं चार्ज कर पाया। मै अपने कमरा में बैठ कर सोचने लगे कि फोन क्यों नहीं उठाते, उसके बाद अगले दिन यानी सोमवार को गांव के बच्चे चंदा मांगने आए"बोले भैया जी चंदा मांगने आए हैं। बिजली के स्तंभ के गिर जाने से तार टूट गया है। मिस्त्री बुला के सही करवाना है। मैंने उससे पूछा कितना रुपए देना पड़ेगा" तब उसने बोला 10₹ चाहिए। मैंने 10₹ दिया। और तब जाकर बिजली गांव में आई ओर हम आराम से अपनी मोबाइल चार्ज किए। फिर से कोशिश किए, आकाश के पास फोन करने का उसने तुरंत फोन उठाया। मैंने पूछा चलोगे नैनीताल घूमने आकाश ने ठीक है चलूंगा हम भी छुट्टी में है। मैंने अपने बैग में कपड़ा और कुछ खाने के लिए भी रखा। पहुंच गए रेलवे स्टेशन पुनः फोन किए आकाश के पास, आकाश ने कहा ठीक है बस 2 ही मिनट में पहुंच गय...

हर तरफ़ तनहाइयाँ

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      हर तरफ़ तनहाइयाँ      जिसको मैंने चाहा था, वो अपना होना सकें। वो दिल दे चुके थे पहले से, वो मुझसे आहें भर ना सकें।। कोशिश तो बहुत किये उनपर, अपनी खुशियाँ लुटाने को। पर क्या करें दोस्तों, वो तो मेरी तरफ भी ना देख सकें।। मुहब्बत की दीवारें इतनी बड़ी खड़ी करदी उसने। जाते- जाते वक्त गुजर गए, जा ना सकें उनके सामने।। फिर भी सोच में पड़ है हम, क्या कमी हैं मुझमें। जो मुझे इस तरह मुझसे दूर होकर जा रहे हैं, मेरे नजरों के सामने।। कल तक जिसे मैं अपना कहा, वो तो हो गए सपनों के समान। भूलकर न देखा मुझे, वो देखते ही आँखों के सामने हो गए वीरान।। अब भूलकर भी नहीं भूल सकता, वो पुरानी बातें। जो मुझे अपनी मुहब्बत के सामने कर दिया था अपमान।। थोड़ा रोकर तो गम कम नहीं हो सकता। जो चला गया मुझे छोड़कर, वो फिर आ नहीं सकता।। क्या फ़ायदा हैं मुझे उनकी बातें जेहन में रखकर। वो तो गैर थे, अब अपना हो नहीं सकता।। कसूर तो मेरी नजरों की थी, जो उसे देखा था। कल्पनाओं में प्यार कर बैठे, और अपना कहा था।। कुछ महसूस होने लगा था, शायद मुझे प्यार हो गया। पर क्या करें, मैं तो गलतफहमी में फँसकर ...

अब शौक नहीं

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  अब शौक नहीं बहुत मजे किए तेरे प्रेम में, करुणा का छाया पाया। हर दिन बिछड़ा दूर तलक, नहीं मैं तेरा प्यार पाया।। अभिलाषा नहीं अब जीने की, तेरे संग तुम्हारे होकर। अब सहन नहीं हैं, जलन हैं, जो दिल पर चोट लगी हैं मुस्काकर। तूने दर्द दिया हैं, दवा नहीं। मेरे टूटे दिल के टुकड़े पूर्ण किये नहीं। विश्वास था तुझपर मेरी होगी। पर क्या हुआ दूसरों के हो गई भोगी।। क्यों छोड़ दिया राहों में, फिर बदनाम किया। लोगों के नज़र मे गिर गए हम। जब नहीं था साथ देने का इश्क़ में, क्यों खुशी दिया और ज्यादा ग़म।। मैंने इश्क़ किया था तुझसे, सजा भी पाया। ना तू मेरे हुए और न  मैं दूसरों के हो पाया।। बस थोड़ी सी साँसें बाकी हैं, मुझे जीने की। फिर तुझसे कैसे कहूँ, तेरे साथ रहने की।। लेखक - मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) Email: manojkumar830070@gmail.com

तूने तो ईट निकालना बन्द कर दिया दीवार से

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    तूने तो ईट निकालना बंद कर दिया दीवार से कल तक तो तूने, बार- बार निकालती थी ईट दीवार से आज ऐसा तेरा मुँह क्यूँ  फूला हैं, गुब्बारे की तरह! जो तूने बंद कर दिया, आना- जाना! और झरोखा से आँख मिलाना  ऐसा अचानक तुझे क्या हो गया  क्या मेरी यादें भाग गई  और दिल मेरा रूठ गया! तख्ती पर लिखकर मेरा ख़त वो भी तख्ती थी, ईट की.. जब कभी तेरी दीवार पर देखते बन्द दिखी मुझे ईट! मैं हैरान होकर; करने लगे वहीं पर अपना माथा पीट कल मिलने यहीं पर रोज आते, मुझसे ख़ुशी- ख़ुशी बोलती आज क्यूँ नजरें नहीं मिलाती मैं परेशान, मेरा दिल परेशान.. अब कैसें मिलूँ, छुप- छिपकर! सामने तो बन्द दरवाजा और परिवारों का समूह अब लगता हैं , मिलन न होगा यारा! न मैं फिर आऊँगा दोबारा! तुझसे हारे , और तेरे ईट से जो बीच में .. खोड़ हो गया सोचते थे मिल लेंगे दो चार बातें कह लेंगे इस उम्मीद में रोज आते थे, दीवार तक! कि उमर गुजर जायेगी यूँ ही  झरोखा से झाँककर, तेरा गोरा मुखड़ा देखकर! अरे! तूने तो ईट निकलना ही बन्द कर दिया!!!! लेखक- मनोज कुमार पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी) Email: manojkumar...

दिल देने की रुसवाई

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  दिल देने की रुसवाई विद्यालय खुलने ही वाला था, तभी अचानक मेरे दोस्त राजू वहां गेट के सामने पहुंच गए। हम वहां अशोक के पेड़ के नीचे खड़े थे।राजू के इंतजार में, राजू आकर हाथ मिलाए ओर बोले,, यहां क्यों खड़े हो अभी गेट क्यों नहीं खुला । सभी लड़के गुमसुम थे।,, "तभी सफेद कार से सफेद कुर्ता में प्रिंसिपल उपस्थित हुए। ओर पूछने लगे गेट अभी तक क्यो नहीं खुला। जितने लड़के थे वहां पर सब ने एक साथ जवाब दिए। साहब अभी चपरासी नहीं आए हैं। उन्हीं के हाथ में है चाभी , प्रिंसिपल फोन किए। चपरासी दौड़ कर आए गेट खोला गया सभी लड़के और लड़कियां प्रवेश हुए। एकाएक करके प्रार्थना में खड़े हो गए। एक तरफ थी लड़के की लाइन एक तरफ थी लड़कियों की लाइन प्रिंसिपल साहब मंच पर गए प्रार्थना होने लगा। हम और हमारे दोस्त राजू प्रार्थना करने लगे। कुछ ही समय बाद प्रार्थना समाप्त हो गया सभी लोग अपने कमरा में भागे, वहीं और राजू धीमी- धीमी चलने लगा कमरा के ओर। तभी अचानक संयोगवश एक लड़की राजू के शरीर से टकरा गई। लड़की ने गुस्सा से बोला,, दिखाई नहीं पड़ता मूर्ख, राजू माफ़ी मांग कर अपने कमरा में आकर बैठ गया। तब! मास्टर साहब बोलो...