तू वही गीत हैं।
तू वही गीत हैं,
जिसे मैं होंठो पर गया था!
तुम भुला दो,
मैं नहीं भूल सकता
तेरी जब भी याद आती थी
आँखों को भिगोकर
अपने दिल को समझाता था।
तू मानो या न मानो
आते थे बार- बार खयाल
तुझे देखने का मन करता था
कभी- कभी तो होश गंवा बैठे थे
दूसरों का राह, अपना समझ बैठे थे
यही तो मेरी नादानियां थी
पतझड़ पेड़ के नीचे तेरी राह देखता था
कभी तो मेरी वाली आयेगी
उम्मीद कमजोर नहीं किए
ओर मजबूत से बांध दिए थे
आज नहीं तो कल मुझसे दीदार होगा
दोनों रहेगें साथ में, और प्यार का प्रसार होगा
कितने गाए हम तेरे खफा के नगमे,
तुझे क्या पता!
तुम तो मुझसे बहुत दूर थे
फिर भी हम तुझपर मरते थे
हम झूठे नहीं थे
पुकारता था होंठ तेरा नाम
कभी न करता था वो आराम
सुबह शाम रटता था
तोता की तरह
लेकिन तुझे क्या पता जानम
तुम तो मेरे दिल से खोए हुए थे
जो तेरी परछाई मेरे पलकों तक नहीं आ सकती थी
मैं गीत न गाता , ओर क्या करता
तुम मुझे याद आए,
तो गीत गाना पड़ा
बहुत मजा आया मुझे,
दर्द कुछ कम हुआ दिल के
सुकून मिला मुझे
ऐसी शुभ घड़ी तेरे प्यार में नहीं मिला कभी
जिस प्रकार उस दिन गाए थे,
लेकिन ये मेरा मन नहीं था
तेरा प्यार ने मुझसे गवाया था।
मैंने उस दिन ख़ूब गया,
तेरा मेरा प्यार कितना निराला हैं
जो मेरे होंठ थके नहीं
मैं गाता रहा,
तेरा दिल सुनता रहा
वो बुलाता था एक दिन आना
पर मुझे मौका न रहा
मैं गाता रहा, मैं गाता रहा,
वो सुनता रहा, वो सुनता रहा!
लेखक- मनोज कुमार
पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी)
Email: manojkumar830070@gmail.com


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