अक़सर ऐसा ही होता हैं।

अकसर ऐसा ही होता हैं।

 


     अक़सर ऐसा ही होता हैं।




अक़सर ऐसा ही होता हैं।

जब प्रेमी - प्रेमिका से मिलने जाते हैं।

सामने नहीं..

खिड़की से कूदकर जाते हैं,

कहीं शक न हो जाए लोगों को

पकड़ न जाएँ हम

मुहब्बत बने बेरहम

छूट न जाए मेरा प्यार

फिर न कर पाऊँ इजहार

अकसर ये बातें सुनने को मिलती हैं।

प्रेमिका भी कम चालाक नहीं होती हैं।

आने से पहले खिड़कियाँ खोल रखती हैं।

बहाने सारे हैं,

प्रेमी उससे भी प्यारे हैं।

ये बहाने बना लेती हैं।

हवा ले रही हूँ,

गर्मी लग रही हैं।

इसलिए खोल दिया हैं।

कितने अच्छे बहाने ढूँढ़ लेती हैं।

प्रेमी ऐसे ही चले जाते हैं।

रूठे हुए सपनों को प्यार से मनाते हैं।

मिलने की ख्वाहिश भी पूरी हो जाती हैं।

दूरियाँ भी कम हो जाती हैं।

ओर जब मिलकर आते हैं;

खिड़कियों के पर्दे गिराकर आते हैं।

कोई समझ ही नहीं पाता हैं।

फिलहाल सामने का दरवाजा बन्द रहता हैं।

अक़सर ऐसा ही होता हैं।।


लेखक- मनोज कुमार

पता: पूरब पुरवा बेलसर ब्लाक जिला गोंडा (यूपी)

Email: manojkumar830070@gmail.com




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

प्रेम विवाह

खून से लिखी चिठ्ठी

हर तरफ़ तनहाइयाँ